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थल सेना दिवस : 15 जनवरी ही वो एतिहासिक दिन है जब भारतीय सेना की कमान एक भारतीय के हाथ में आई थी. आज आर्मी डे है. 15 जनवरी ही वो एतिहासिक दिन है जब भारतीय सेना की कमान एक भारतीय के हाथ में आई थी. कर्नल सेवानिवृत शिवकुमार कुंजरू बताते हैं कि ‘1948, 15 जनवरी को लेफ्टिनेंट जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) केएम करियप्पा ने भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडिग इन चीफ के रूप में अंतिम ब्रिटिश कमांडर सर फ्रैंसिस बुचर से पद भार संभाला था.

इसी की याद में भारतीय में हर साल 15 जनवरी को सेना दिवस मनाया जाता है. इस खास दिन ही सेना अपनी उन लड़ाई को भी याद करती है जिसमे दुश्मनों को धूल चटाई थी. इस मौके पर सेना के अत्याधुनिक हथियारों और साजो-सामान जैसे टैंक, मिसाइल, बख्तरबंद वाहन आदि प्रदर्शित किए जाते हैं.

कुंजरू ने कहा, ‘इस दिन सेना प्रमुख दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने वाले जवानों और जंग के दौरान देश के लिए बलिदान करने वाले शहीदों की विधवाओं को सेना मैडल और अन्य पुरस्कारों से सम्मानित करते हैं. उस समय सेना में करीब 2 लाख सैनिक ही थे, लेकिन अब भारतीय थल सेना में 14 लाख से अधिक जांबाज हैं। TechSingh123.com इन जाबांजों को Army Day सलाम करता है, वहीं देश के शहीदों को नमन करता है।

ये हैं वो लड़ाईयां जिनसे सजा है इंडियन आर्मी का इतिहास

नाथुला दर्रे में लड़ी गई थी 1967 की भारत-चीन लड़ाई

वर्ष 1967 को ऐसे साल के तौर पर याद किया जाता रहेगा जब हमारे सैनिकों ने चीनी दुस्साहस का मुंहतोड़ जवाब देते हुए सैकड़ों चीनी सैनिकों को न सिर्फ मार गिराया था, बल्कि उनके कई बंकरों को ध्वस्त कर दिया था. रणनीतिक स्थिति वाले 14,200 फीट पर नाथुला दर्रे में ये लड़ाई हुई थी. नाथुला दर्रा तिब्बत-सिक्किम सीमा पर है, जिससे होकर पुराना गैंगटोक-यातुंग-ल्हासा व्यापार मार्ग गुजरता है. 1967 के टकराव के दौरान भारत की 2 ग्रेनेडियर्स बटालियन के जिम्मे नाथुला की सुरक्षा थी. इस बटालियन की कमान तब ल़े कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) राय सिंह के हाथों में थी.

23 अक्तूबर1947 को पाक कबाइलियों से हुआ था

वैसे तो कश्मीर घाटी में कबाइली कई दिन से उत्पाद मचा रहे थे. लेकिन कबाइलियों की ओर से सबसे बड़ा हमला 23 अक्तूबर को मुजफ्फराबाद की ओर से हुआ. एक तो यहां मौजूद राज्य पुलिस के जवान संख्या में कम थे और दूसरा पुंछ के लोग भी हमलावरों में शामिल हो गए. मुजफ्फराबाद पूरी तरह से बर्बाद हो गया. मुजफ्फराबाद को तबाह करने के बाद कबाइलियों का अगला निशाना थे उड़ी और बारामूला. 23 अक्तूबर, 1947 को उड़ी में घमासान युद्ध हुआ. 

हमलावरों को रोकने के लिए ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में वहां मौजूद सेना उड़ी में वह पुल ध्वस्त करने में कामयाब हुई, जिससे हमलावरों को गुजरना था. एक पठान की गोली लगने से ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह वहीं शहीद हो गए. लेकिन हमलावर आगे नहीं बढ़ पाए. भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर में कबाइलियों का सामना करने के लिए विमान और सड़क मार्ग से पहुंच गई.

1965 में भारत के 26 हजार सैनिक घुस गए थे पाक में

भारत और पाकिस्‍तान के बीच 1965 की जंग की वजह कश्‍मीर विवाद से अलग गुजरात में मौजूद कच्‍छ के रण की सीमा थी. इस सीमा पर पाक ने जनवरी 1965 से गश्‍त शुरू की थी. 5 अगस्त 1965 को भारत के 26,000 सैनिकों ने लाइन ऑफ कंट्रोल को पार किया था.  उस वक्त पाकिस्तान ने कश्मीर के उरी और पुंछ जैसे इलाकों पर अपना कब्जा कर लिया था तो वहीं भारत ने पीआके से करीब आठ किलोमीटर दूरी पर स्थित हाजी पीर पास को अपने कब्जे में कर लिया था.

पाक की ओर से चलाया गया ऑपरेयान ग्रैंड स्लैम बुरी तरह से फेल हो गया था. अपने ऊपर हमले बढ़ते देखकर पाक ने कश्मीर के साथ ही पंजाब को निशाना बनाना शुरू किया लेकिन इस बार भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी. छह सितंबर को भारत की ओर से इस युद्ध की शुरुआत की आधिकारिक घोषणा की गई. यह युद्ध 23 सितंबर 1965 को खत्म हुआ था.

1971 में जब पाक से अलग कर दिया बांग्लादेश

भारत ने युद्ध से पहले रूस के साथ समझौता किया था, इंटरनेशनल लेवल पर बांग्लादेश की रिफ्यूजी समस्या को जोरदार ढंग से उठाया था. पाकिस्तान इस भुलावे में था कि अमेरिका और चीन उसकी हेल्प करेंगे. पाकिस्तान की मदद के लिए अमेरिका ने सेवंथ फ्लीट बेड़े को हिंद महासागर में भेज दिया था, लेकिन भारत ने रूस से जो समझौता किया था, उसकी वजह से भारत की मदद के लिए रूस ने अपनी न्यूक्लियर सब मैरिन भेज दी.

भारत ने ईस्ट पाकिस्तान में तेजी से वॉर कर तीन दिन में ही एयर फोर्स और नेवल विंग को तबाह कर दिया. इस वजह से ईस्ट पाकिस्तान की राजधानी ढाका में पैराट्रूपर्स आसानी से उतर गए, जिसका पता जनरल एएके नियाजी को 48 घंटे बाद लगा. उसने सोचा था कि भारत की सेना ईस्ट पाकिस्तान में नदियों को पार कर ढाका तक नहीं पहुंच पाएगी और वह बॉर्डर पर ही उलझे रहेंगे. यह उसकी भूल साबित हुई. भारतीय सेना ने पैराट्रूपर्स की मदद से ढाका को ही घेर लिया. वहीं मुक्ति वाहिनी की मदद से भारतीय सेना, ईस्ट पाकिस्तान के बार्डर से अंदर तक घुस गई.

लोंगेवाला युद्ध: जब 120 भारतीय सैनिकों ने टैंक से लैस 2000 पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ा था

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में राजस्थान के लोंगेवाला मोर्चे पर हुई लड़ाई खास महत्व रखती है. दरअसल, यह एक ऐसी लड़ाई थी, जिसमें एक तरफ टैंकों के साथ पाकिस्तान के हजारों सैनिक थे. वहीं दूसरी तरफ लोंगेवाला मोर्चे पर सिर्फ़ 120 भारतीय जवान. बावजूद इसके जिस तरह से भारतीय सेना ने पाक सैनिकों को पीछे धकेला वो अभूतपूर्व और ऐतिहासिक था. भारत ने इस लड़ाई को कैसे अपने नाम किया आइए जानते हैं:

4 दिसंबर की रात से शुरू हुई थी लोंगेवाला युद्ध की कहानी

लोंगेवाला युद्ध की कहानी 4 दिसंबर 1971 की रात शुरू हुई थी. भारतीय सेना ने पैट्रोलिंग के दौरान बॉर्डर के पार चहल-पहल को महसूस किया. इसे भारतीय जवानों ने गंभीरता से लिया और नज़र बनाए रखी. जल्द पता चल गया कि पाकिस्‍तानी सेना टैंकों के साथ भारत की ओर बढ़ रही है. ऐसे में सेकेंड लेफ्टिनेंट धरम वीर की टीम ने मेजर चांदपुरी को इसकी सूचना दी. जिसके बाद मुख्‍यालय से अतिरिक्त फोर्स की मांग की गई.

लोंगेवाला के मोर्चे पर सिर्फ 120 भारतीय जवान मौजूद थे

सुबह से पहले मदद संभव नहीं थी. ऐसे में चांदपुरी ने अपने 120 सैनिकों के साथ तय किया कि वो किसी भी कीमत पर दुश्मन को आगे नहीं बढ़ने देंगे. हालांकि, यह आसान नहीं था. भारतीय सेना के पास मौके पर 2 एंटी टैंक गन्स, कुछ मोर्टार और राइफल्स के साथ सिर्फ़ 120 जवान थे. जबकि दुश्मन 45 शरमन टैंक्स, 500 से अधिक बख्तरबंद गाड़ियों और करीब 2000 सैनिकों के साथ आगे बढ़ रहा था.

कुछ ही घंटों में पाकिस्तानी सेना के 12 टैंक उड़ा दिए गए

वो लोंगेवाला से आगे बढ़ के रामगढ़ और फिर जैसलमेर तक कब्ज़ा करना चाहते थे. मेजर चांदपुरी दुश्मन के इरादे समझ गए थे. लिहाजा, उन्होंने अपने साथियों के साथ एक खास योजना तैयार की और दुश्मन को नज़दीक आने दिया. जैसे ही विरोधी रडार में आए भारतीय सैनिक पूरी ताकत से उनके ऊपर टूट पड़े. एक के बाद एक भारतीय सैनिक पाकिस्तानी सेना के 12 टैंक उड़ाने में सफल रहे.

पाक सेना को लोंगेवाला पर रोकने में कामयाब रहे भारतीय

ऐसे में दुश्मन कमजोर पड़ गया. अपनी योजना के तहत भारतीय सैनिक सुबह तक पाकिस्तानी सेना को लोंगेवाला पर रोकने में कामयाब रहे. आगे सुबह का उजाला होते ही एयर फोर्स ने विरोधियों पर हमला किया और 22 टैंक्स और 100 से ज़्यादा बख़्तरबंद गाड़ियां को उड़ाकर उन्हें पैदल ही भागने पर मज़बूर कर दिया.

लोंगेवाला युद्ध के हीरो बने दिवंगत कुलदीप सिंह चांदपुरी

इस युद्ध के बाद पाकिस्तान में एक जांच कमीशन बैठा, जिसने पाक कमांडर मेजर जनरल मुस्तफा को दोषी बताते हुए नौकरी से निकाल दिया, जबकि भारत ने मेजर चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. इस युद्ध को अब 50 साल हो चुके हैं. लोंगेवाला मोर्चे पर हुई लड़ाई के हीरो माने जाने वाले चांदपुरी अब हमारे बीच में नहीं हैं. ब्रिगेडियर पद से रिटायर होने के बाद 78 साल की उम्र में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली थी. बता दें, 1997 में ‘बॉर्डर’ नाम की एक फिल्‍म भी रिलीज हुई, जिसकी कहानी लोंगेवाला की लड़ाई पर ही आधारित है.

कारगिल में पाक सेना के मारे थे 2700 सैनिक

पाकिस्तानी सेना 1998 से ही कारगिल युद्ध करने की कोशिशों में थी. इसके लिए उन्होंने अपने 5000 जवानों को कारगिल की चढ़ाई करने के लिए भेजा था. सरकार को खबर मिली थी कि पाकिस्तान ने कारगिल के एक हिस्से पर कब्जा कर लिया है. इसके बाद दुश्मनों को अपनी जमीन से दूर भगाने के लिए ऑपरेशन विजय शुरू हुआ.

इंडियन एयरफोर्स ने पाकिस्तान के खिलाफ मिग-27 और मिग-29 का इस्तेमाल किया था.  मिग-27 की मदद से उन जगहों पर बम गिराए थे जहां पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा था.  साथ ही मिग-29 से पाकिस्तान के कई ठिकानों पर आर-77 मिलाइलें दागी गईं थीं. 8 मई को शुरू हुए इस युद्ध में 11 मई से इंडियन एयरफोर्स की एक टुकड़ी ने सेना की मदद करनी शुरू कर दी थी.

1999 में लड़े गए कारगिल युद्ध में 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए थे. 300 से ज्यादा तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों से रोजाना करीब 5,000 बम फायर किए जाते थे. लड़ाई के अहम 17 दिनों में हर रोज हर आर्टिलरी बैटरी से एवरेज एक मिनट में एक राउंड फायर किया गया था. सेकेंड वर्ल्ड वार के बाद यह पहली ऐसी लड़ाई थी, जिसमें किसी एक देश ने दुश्मन देश की सेना पर इतनी ज्यादा बमबारी की थी.

दूसरे देशों में ऑपरेशन कर कराया ताकत का अहसास

1988 को मालदीव में किया गया ऑपरेशन कैक्टस हो या फिर 1987 में श्रीलंका जाकर ऑपरेशन पवन के तहत लिट्टों को खदेड़ने की बात, हर जगह भारतीय सेना उम्मीदों पर खरी उतरी थी. तख्ता पलट की कोशिश के दौरान जब मालदीव कई देशों से मदद मांग रहा था तो सरकार ने आर्मी और एयर फोर्स पर भरोसा करते हुए सिर्फ डेढ़ घंटे में मदद पहुंचाई थी.

अगर 1984 की बात करें तो आर्मी ने सियाचिन में ऑपरेशन मेघदूत के तहत पाकिस्तानी कब्जे की कोशिश को नाकाम किया था. जिसका असर ये हुआ कि आजतक पाक सियाचिन की ओर दोबारा निगाह नहीं उठा पाया है.

भारतीय सेना के बारे में जाने 10 रोचक फैक्ट्स

1. दुनिया की सबसे ऊंची रणभूमि है, सियाचिन ग्लेशियर समुद्र तल से पांच हजार मीटर ऊंचाई पर बरफ की चहार दिवारी में छुपकर दुश्मन पर नजर रखती है। 

2. दुनिया की सबसे बड़ी स्वैच्छिक सेना है, भारत के पास सभी सेवारत और रिज़र्व सेना के पास अपनी सेवा देने या न देने का अधिकार होता है, यह अधिकार भारत के संविधान में भी दर्ज है, भारतीय सेना में किसी व्यक्ति का धर्म और जाति नहीं देखी जाती है। 

3. ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों लड़ने की महारत भारत के पास ही है। भारतीय सेना की ओर से High Altitude Warfare School दुनियाभर के सैनिकों को ट्रैनिंग देता है।

4. भारत ने दो बार परमाणु परीक्षण किया है। पहला 1970 और दूसरा 1990 में। इन परीक्षणों के बाद दुनिया ने भारत की ताकत देखी थी। कई खुफिया एजेंसियां भी इस परीक्षण के बाद ही जान पाई थी। 

5. मध्यप्रदेश में इंदौर जिले में स्थित महू भारत की पुरानी छावनियों में से  एक है, 1840 से 1948 तक यहां रेजिमेंट की ट्रेनिंग होती थी। यह उस समय का Military headquarters of War (MHOW) था, तभी से इसका नाम शार्ट में महू हो गया था।

6. 1971 के भारत-पाकिस्तान के बीच में राजस्थान के लोंगेवाला लड़ाई लोंगेवाला युद्ध की कहानी 4 दिसंबर 1971 की रात शुरू हुई थी, इसी लड़ाई पर सनी दयोल की फिल्म बॉर्डर बनी थी। खासबात यह थी कि मात्र 120 जवानों ने पाकिस्तान के 2000 सैनिकों को धूल चटा दी थी। भारतीय सेना के पास उस समय एक जीप थी और पाकिस्तानी सेना के पास करीब 45 शरमन टैंक्स, 500 से अधिक बख्तरबंद गाड़ियों थे।

7. भारतीय सेना ने 2013 में ऑपरेशन राहत चलाया था। जो अब तक का सबसे बडा़ बचाव मिशन था। यह मिशन भारतीय वायु सेना ने चलाया था, उत्तराखंड में आई भयंकर बाढ़ के दौरान इन जांबाज सैनिकों ने 20 हजार लोगों को बचाया था।

8. भारतीय सेना के पास घुड़सवार सेना की एक रेजीमेंट भी है, जो दुनिया में तीन देशों के पास ही है।

9. भारत में सबसे बड़ी निर्माण एजेंसियों में से एक है  सैन्य इंजीनियरिंग सेवा (MES), एमईएस और सीमा सड़क संगठन (BRO) पर देश की बेहद शानदार सडकों के निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी है। दुनिया में सबसे ऊँची सड़क खर्दुन्गला और चुम्बकीय पहाड़ी जैसी सडकों के रखरखाव की जिम्मेदारी भी यही एजेंसी करती है।

10. 1971 में भारत और पाकिस्तान युद्ध हआ था। युद्ध में पराजय के बाद 93,000 पाकिस्तानी जवानों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था। यह अब तक का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण था।

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